02

Ruhani viraj

विराज कपूर का पेंटहाउस शहर की सबसे ऊँची इमारत की सबसे ऊपरी मंजिल पर था। बाहर से देखने पर यह तरक्की का प्रतीक था, लेकिन जैसे ही रूहानी ने उसके अंदर कदम रखा, उसे महसूस हुआ कि यहाँ की हवा में भारीपन था—एक ऐसा भारीपन जो सिर्फ सत्ता और बेपनाह दौलत से आता है।

जैसे ही वे अंदर एंटर हुई, विराज ने अपना भारी ब्लैक कोट उतारकर बेपरवाही से सोफे पर फेंका। उसने अपनी शर्ट के कफलिंक्स खोले और आस्तीनें ऊपर चढ़ाने लगा। उसके हाथ की नसों का उभार और उसकी सधी हुई हरकतें रूहानी को डरा रही थीं।

"तो, रूहानी सहगल... स्वागत है तुम्हारे नए जहान में," विराज की आवाज उस खाली हॉल में गूँजी। उसकी आवाज में कोई स्वागत नहीं था, सिर्फ एक विजेता का घमंड था।

रूहानी ने कमरे के चारों ओर देखा। हर चीज़ कीमती थी—महंगे इतालवी मार्बल से लेकर दीवारों पर लगी अजीब सी डार्क पेंटिंग्स तक। "ये तुम्हारा घर हो सकता है, विराज। लेकिन मेरे लिए ये सिर्फ एक सौदा है। एक साल... और फिर मैं यहाँ से चली जाऊँगी।"

विराज, जो अपनी व्हिस्की के गिलास की तरफ बढ़ रहा था, अचानक रुक गया। वह धीरे से मुड़ा। उसके चेहरे पर एक ऐसी मुस्कुराहट आई जो किसी ठंडे शिकारी के चेहरे पर होती है जब उसका शिकार भागने की नाकाम कोशिश करता है।

"एक साल?" वह धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ने लगा। उसके जूतों की आवाज़ फर्श पर 'टप-टप' कर रही थी, जो रूहानी के दिल की धड़कन से मेल खा रही थी। "रूहानी, तुम अभी भी गलतफहमी में हो। इस घर की दहलीज लांघते ही तुम्हारी पहचान खत्म हो गई है। अब तुम 'रूहानी सहगल' नहीं हो। तुम सिर्फ मेरी एक 'Property' हो।"

रूहानी ने पीछे हटने की कोशिश की, लेकिन दो कदम बाद ही उसकी पीठ ठंडी दीवार से जा लगी। विराज ने रुकने का नाम नहीं लिया। वह तब तक करीब आता रहा जब तक कि रूहानी को उसके शरीर की तपिश महसूस नहीं होने लगी। उसने अपना एक हाथ रूहानी के चेहरे के ठीक बगल में दीवार पर टिका दिया, उसे पूरी तरह अपने और दीवार के बीच कैद कर लिया।

विराज ने अपना चेहरा उसके इतना करीब लाया कि उनकी नाक टकराने ही वाली थी। रूहानी ने अपनी आँखें बंद कर लीं, लेकिन विराज की भारी और गर्म साँसें उसके चेहरे पर पड़ रही थीं।

"आँखें खोलो!" विराज ने हुक्म दिया। उसकी आवाज़ नीची थी, लेकिन उसमें एक ऐसी ताकत थी जिसे ठुकराना नामुमकिन था।

रूहानी ने डरते हुए अपनी पलकें उठाईं। विराज की आँखें काली पड़ चुकी थीं। "इस घर में मेरे हुक्म के बिना तुम अपनी पलकें भी नहीं झपकाओगी। समझे?"

रूहानी के होंठ कांपे। "तुम... तुम मुझसे जबरदस्ती नहीं कर सकते।"

विराज के चेहरे पर एक डार्क हंसी आई। उसने अपना दूसरा हाथ रूहानी की गर्दन पर रखा। उसकी पकड़ मजबूत थी, पर दर्द देने वाली नहीं—बस इतनी कि रूहानी को अहसास हो जाए कि उसकी जान विराज की मुट्ठी में है। "जबरदस्ती की ज़रूरत उन्हें पड़ती है जिनके पास ताकत नहीं होती। मैं तो बस तुम्हें तुम्हारी औकात याद दिला रहा हूँ।"

उसने रूहानी को छोड़ दिया और पीछे हटकर उसे ऊपर से नीचे तक देखा। "ऊपर जाओ। बाईं तरफ का आखिरी कमरा तुम्हारा है। वहाँ अलमारी में कुछ कपड़े रखे हैं। उन्हें पहनो और ठीक आधे घंटे बाद मेरे बेडरूम में आओ।"

"कपड़े? मेरे पास मेरे अपने कपड़े हैं," रूहानी ने विरोध किया।

"वो कूड़ा मैंने पहले ही फिंकवा दिया है," विराज ने बेपरवाही से अपना गिलास उठाते हुए कहा। "अब से तुम वही पहनोगी जो मैं देखना चाहता हूँ। और याद रखना... घड़ी की सुइयां मेरे मिजाज की तरह तेज चलती हैं। अगर देर हुई, तो तुम्हारा भाई आज की रात जेल की कालकोठरी में बिताएगा।"

रूहानी का दिल डूब गया। वह कांपते कदमों से सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर गई। जब उसने अपने कमरे की अलमारी खोली, तो उसकी चीख निकलते-निकलते रह गई। वहाँ एक भी जींस, टॉप या सूट नहीं था। पूरी अलमारी रेशमी (Silk) और साटन के कपड़ों से भरी थी। वे कपड़े इतने महीन और छोटे थे कि उन्हें पहनना किसी नग्नता से कम नहीं था। गहरे लाल, काले और बैंगनी रंगों के उन कपड़ों में एक अजीब सी उत्तेजना और अधिकार की बू आ रही थी।

उसने एक गहरे लाल रंग की सिल्क नाइटगाउन निकाली। उसका कपड़ा इतना पतला था कि छूने पर पानी जैसा महसूस हो रहा था। उसे पहनते समय रूहानी की रूह कांप रही थी। जब उसने शीशे में खुद को देखा, तो उसे खुद से नफरत होने लगी। वह गला काफी गहरा था और सिल्क उसकी बॉडी के हर कर्व से लिपट रहा था।

ठीक 29वें मिनट पर, वह विराज के बेडरूम के भारी दरवाजे के सामने खड़ी थी। उसका हाथ कांप रहा था जब उसने दरवाजा खोला।

कमरा अर्ध-अंधेरे (Semi-darkness) में डूबा था। सिर्फ बेड के किनारे जल रहे लैंप की पीली रोशनी कमरे के माहौल को और भी भारी बना रही थी। विराज बेड पर बैठा था, उसके हाथ में वही व्हिस्की का गिलास था। उसने शर्ट के बटन खोल दिए थे, जिससे उसका चौड़ा और गठीला सीना साफ दिख रहा था।

जैसे ही रूहानी अंदर आई, विराज की नजरें उस पर जम गईं। उसने रूहानी को ऊपर से नीचे तक ऐसे देखा जैसे कोई पारखी अपनी नई खरीदी हुई कीमती चीज़ को देखता है। उसकी आँखों में चमक रही वह 'भूख' रूहानी को अंदर तक झकझोर गई।

"करीब आओ," विराज ने अपनी गहरी आवाज़ में कहा।

रूहानी धीरे-धीरे बेड की तरफ बढ़ी। उसके नंगे पैर ठंडे फर्श पर पड़ रहे थे। विराज ने अपना गिलास साइड टेबल पर रखा और खड़ा हो गया। वह रूहानी के सामने आकर रुका और उसके चेहरे पर आई एक hair strand को अपनी उंगलियों से पीछे किया। उसकी उंगलियों का स्पर्श रूहानी की त्वचा पर बिजली की तरह दौड़ा।

"लाल रंग तुम पर जंचता है," विराज ने फुसफुसाते हुए कहा। उसने अपना हाथ रूहानी की कमर पर रखा और उसे झटके से अपनी तरफ खींचा। रूहानी का सीना विराज के मजबूत सीने से टकराया।

"विराज... प्लीज..." रूहानी ने उसके सीने पर हाथ रखकर उसे दूर धकेलने की कोशिश की, लेकिन विराज एक चट्टान की तरह खड़ा रहा।

"अभी तो शुरुआत है, रूहानी। आज रात तुम्हें सीखना होगा कि 'हाँ, सर' कैसे कहते हैं।" उसने रूहानी की गर्दन के पास अपना चेहरा झुकाया और उसकी महक को अंदर खींचा।

आपको ये कहानी कैसी लगी कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं या लाइक करना ना भूले❤️

Write a comment ...

Stolen hearts ❤️

Show your support

Meri dark romance ki duniya aur obsessive kahaniyon ko itna pyaar dene ke liye shukriya. Aapka har ek chota contribution mujhe naye twists aur intense chapters likhne ka fuel deta hai. Thank you for fueling my imagination and keeping the stories alive. You guys are the absolute best! 🖤🥀"

Write a comment ...