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Viraj kapoor

कपूर एम्पायर का बोर्डरूम किसी आलीशान कब्रिस्तान की तरह खामोश था। बाहर मुंबई की सड़कों पर भागती गाड़ियों का शोर था, पर इस 40वीं मंजिल के बंद कमरे में सिर्फ मौत जैसी शांति और डर का पहरा था। मेज के एक तरफ मिस्टर सहगल बैठे थे, जिनकी सफेद शर्ट पसीने से तर-बतर हो चुकी थी। उनके कांपते हाथ मेज पर रखे पानी के गिलास तक पहुँचने की हिम्मत भी नहीं जुटा पा रहे थे। उनकी साँसें उखड़ी हुई थीं, जैसे कोई फांसी के फंदे का इंतज़ार कर रहा हो।

दूसरी तरफ, महोगनी की उस विशाल मेज के पीछे, एक ऊँची चमड़े की कुर्सी पर विराज कपूर बैठा था—अंधेरे का बेताज बादशाह। 31 साल की उम्र में एशिया की नंबर वन कंपनी, 'कपूर इंडस्ट्रीज' का इकलौता वारिस। 6 फुट 2 इंच का कसरती बदन, तीखे नैन-नक्श और एक ऐसी शख्सियत जो सामने वाले को बिना एक लफ्ज़ बोले घुटनों पर ला दे। विराज की आँखों में दया नाम की कोई चीज़ नहीं थी; वहाँ सिर्फ ठंडी गणना और अटूट सत्ता का वास था। वह उस शिकारी की तरह था जो अपने शिकार की तड़प का आनंद नहीं लेता, बल्कि उसे अपनी नियति मानकर स्वीकार कर लेता है।

विराज ने बड़े ही सलीके से 500 करोड़ के कर्ज के कागजात मेज पर फेंके। कागज के गिरने की सरसराहट भी उस सन्नाटे में किसी चाबुक की आवाज की तरह गूँजी।

"पाँच सौ करोड़, सहगल," विराज की आवाज गहरी और ठंडी थी, जैसे किसी पुरानी गुफा की गूँज। उसने अपनी व्हिस्की का गिलास उठाया और उसमें पड़े बर्फ के टुकड़ों को घुमाया। "इतना पैसा... तुम्हारी सात पुश्तें अपनी खाल बेचकर भी नहीं चुका पाएंगी। कपूर इंडस्ट्रीज का पैसा डूबता नहीं है, और जो उसे डुबाने की कोशिश करता है, मैं उसे मिट्टी में मिला देता हूँ। तो बताओ सहगल, तुम्हारी जान लूँ या तुम्हारी बची-कुची जायदाद नीलाम कर दूँ?"

"विराज... प्लीज... मुझे थोड़ा और वक्त दो। मैं... मैं सब ठीक कर दूँगा," सहगल गिड़गिड़ाया। उसकी आवाज़ में वो दम नहीं बचा था जो एक बिज़नेसमैन में होना चाहिए।

विराज अपनी कुर्सी से धीरे से उठा। उसकी लंबी परछाईं पूरे कमरे पर किसी साये की तरह छा गई। वह टहलते हुए बड़ी कांच की खिड़की के पास गया, जहाँ से पूरा शहर उसके कदमों में बिछा हुआ नजर आता था। वह शहर का मालिक था, और आज वह एक ज़िंदगी का फैसला करने वाला था।

"वक्त की कीमत सबसे ज्यादा होती है सहगल, और तुम उसे गँवा चुके हो," विराज घूमा और उसकी नजरें सीधे कमरे के सुदूर कोने में खड़ी रूहानी पर जाकर रुक गईं।

रूहानी, जो अब तक दीवार से सटी खुद को छोटा दिखाने की कोशिश कर रही थी, विराज की नजर पड़ते ही कांप उठी। वह सफेद लिबास में किसी मासूम चिड़िया जैसी लग रही थी, जिसे बाज़ ने देख लिया हो। विराज की नजरें रूहानी के चेहरे के उतार-चढ़ाव को पढ़ रही थीं। उसके कांपते हुए गुलाबी लब, उसकी भीगी हुई पलकें और उसकी वो मासूमियत—विराज का claim उसी पल तय हो गया था।

"मुझे तुम्हारी जायदाद में कोई दिलचस्पी नहीं है सहगल," विराज ने धीरे से कहा, उसका हर एक शब्द दबदबे से भरा था। "वो कौड़ियों के भाव बिक जाएगी। मुझे कुछ ऐसा चाहिए जिसकी कीमत 500 करोड़ से कहीं ज्यादा हो। मुझे रूहानी चाहिए। अगले एक साल के लिए। मेरे पेंटहाउस में। मेरी मर्जी के मुताबिक। वह रहेगी भी मेरी मर्जी से, और सोएगी भी मेरी मर्जी से।"

रूहानी की आँखें फटी की फटी रह गईं। कलेजा मुँह को आ गया। "क्या? मैं कोई सामान नहीं हूँ जिसका आप सौदा कर सकें! आप... आप इंसान हैं या शैतान?"

विराज के चेहरे पर एक डरावनी मुस्कुराहट आई। वह रूहानी की तरफ बढ़ा। उसके हर कदम के साथ रूहानी के पीछे हटने की जगह खत्म हो रही थी। जब वह रूहानी के बिल्कुल करीब पहुँचा, तो रूहानी को उसके महंगे परफ्यूम और सिगार की कड़वी महक महसूस हुई। विराज का लंबा और चौड़ा शरीर रूहानी पर किसी अंधेरी गुफा की तरह छा गया।

उसने अपना मजबूत हाथ आगे बढ़ाया और रूहानी की नाजुक chin को अपनी उंगलियों के बीच बेरहमी से जकड़ लिया। रूहानी को दर्द हुआ, पर विराज की आँखों में जल रहे उस काले जुनून ने उसे सुन्न कर दिया।

"तुम अब वही हो रूहानी सहगल, जो मैं चाहूँगा," विराज ने उसके कान के पास झुककर फुसफुसाया। उसकी गर्म साँसें रूहानी की गर्दन पर सिहरन पैदा कर रही थीं। "अगली 365 रातें... तुम्हारी हर एक साँस, तुम्हारा हर एक एहसास, और तुम्हारे बदन का हर एक कतरा सिर्फ मेरा होगा। तुम मेरी प्रॉपर्टी हो, मेरा जुनून हो। कॉन्ट्रैक्ट साइन करो, या अपने बाप को तबाही के मंजर के लिए तैयार करो। फैसला तुम्हारा है—अपनी इज़्ज़त या अपने बाप की ज़िंदगी।"

रूहानी ने बेबसी से अपने पिता की ओर देखा। मिस्टर सहगल ने अपनी नजरें झुका ली थीं। उनके पास कोई रास्ता नहीं था, और रूहानी के पास कोई विकल्प नहीं। वह समझ गई थी कि विराज कपूर जो चाहता है, वह उसे हासिल करके रहता है—चाहे वह साम्राज्य हो या कोई औरत।

कांपते हाथों से, आँसुओं को पीते हुए, रूहानी ने उस काले कॉन्ट्रैक्ट पर अपने दस्तखत कर दिए। वह कागज़ का टुकड़ा नहीं था, वह उसकी रूह का सौदा था।

विराज ने वो कागज लिया और एक ठंडी, विजयी मुस्कुराहट के साथ उसे देखा। उसने रूहानी के चेहरे को एक आखिरी बार करीब से निहारा, जैसे अपनी जीत का स्वाद चख रहा हो।

"स्मार्ट गर्ल। रोना बंद करो, क्योंकि अब तुम्हारी आँखों से गिरने वाला हर आँसू भी मेरी इजाज़त से गिरेगा। अब चलो... तुम्हारा नया पिंजरा तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है।"

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Meri dark romance ki duniya aur obsessive kahaniyon ko itna pyaar dene ke liye shukriya. Aapka har ek chota contribution mujhe naye twists aur intense chapters likhne ka fuel deta hai. Thank you for fueling my imagination and keeping the stories alive. You guys are the absolute best! 🖤🥀"

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